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एक थी डायन – बिहार विशेष

एक-थी-डायन-बिहार-विशेष

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2015 की एक रात बिहार के पूर्णिया जिले के एक छोटे से गांव में अचानक भीड़ जमा हो गई। आरोप था कि गांव में फैल रही बीमारी और लगातार हो रही मौतों के पीछे एक महिला का “जादू-टोना” है। कुछ घंटों के भीतर ही आरोप फैसला बन गया। भीड़ ने उस महिला को घर से घसीटकर निकाला, पीटा और जिंदा जला दिया।

अगले दिन अखबारों में यह खबर बस एक छोटी-सी लाइन बनकर रह गई— “डायन बताकर महिला की हत्या”

लेकिन उस एक लाइन के पीछे एक पूरी जिंदगी खत्म हो गई थी।

पत्रकार Sonal Pateria की ग्राउंड रिपोर्ट्स बताती हैं कि बिहार में “डायन” का आरोप अक्सर किसी अलौकिक डर से कम और समाज की क्रूर राजनीति से ज्यादा जुड़ा होता है। गांवों में यह आरोप एक हथियार बन चुका है—और सबसे आसान निशाना होती हैं महिलाएँ।


अंधविश्वास नहीं, सत्ता का खेल

जब किसी महिला को “डायन” कहा जाता है, तो कहानी आमतौर पर कुछ इस तरह शुरू होती है:
किसी बच्चे की अचानक मौत हो जाती है, किसी के घर बीमारी फैल जाती है, फसल खराब हो जाती है या मवेशी मर जाते हैं।

गांव में कोई “ओझा” या “तांत्रिक” बुलाया जाता है। वह कुछ मंत्र पढ़ता है, थोड़ी रहस्यपूर्ण भाषा बोलता है और फिर एक नाम ले देता है—अक्सर किसी गरीब, विधवा या अकेली महिला का।

बस, वहीं से भीड़ का न्याय शुरू हो जाता है।

लेकिन जब इन मामलों को थोड़ा गहराई से देखा जाता है तो कई बार असली वजहें सामने आती हैं—


आंकड़े जो डराते हैं

भारत में “डायन” बताकर हत्या के सबसे ज्यादा मामले झारखंड, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों से आते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले दो दशकों में हजारों महिलाएँ इस आरोप में मारी जा चुकी हैं

बिहार में भी हर साल ऐसे कई मामले सामने आते हैं, और सामाजिक संगठनों का कहना है कि वास्तविक संख्या दर्ज मामलों से कहीं ज्यादा होती है क्योंकि कई घटनाएँ पुलिस तक पहुँचती ही नहीं।


एक और घटना, एक और कहानी

कुछ साल पहले बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक बुजुर्ग महिला पर गांव वालों ने आरोप लगाया कि वह “डायन” है और उसी की वजह से गांव में बच्चे बीमार पड़ रहे हैं।

भीड़ ने उसे पीटा, उसके बाल काट दिए और गांव से निकाल दिया।

बाद में पता चला कि जिस परिवार ने आरोप लगाया था, वह उसी महिला की जमीन पर कब्जा करना चाहता था।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी—उस महिला का घर, सम्मान और जीवन सब छिन चुका था।


कानून है, लेकिन डर अभी भी बड़ा है

बिहार में “डायन प्रथा” के खिलाफ कानून मौजूद है। किसी महिला को डायन कहना भी अपराध है।

लेकिन कानून किताबों में जितना मजबूत दिखता है, जमीन पर उतना ही कमजोर पड़ जाता है।

गांवों में सामाजिक दबाव इतना ज्यादा होता है कि पीड़ित परिवार अक्सर शिकायत ही नहीं करते।
और अगर मामला पुलिस तक पहुँच भी जाए, तो गवाह पीछे हट जाते हैं क्योंकि वे उसी समाज में रहते हैं जहाँ भीड़ ने हमला किया था।


यह सिर्फ अंधविश्वास नहीं, समाज का आईना है

जब भी “डायन” के नाम पर हत्या की खबर आती है, हम इसे अक्सर ग्रामीण अंधविश्वास कहकर आगे बढ़ जाते हैं।

लेकिन असल सवाल इससे कहीं बड़ा है।

अगर किसी समाज में एक महिला को सिर्फ आरोप के आधार पर भीड़ मार सकती है, तो इसका मतलब है कि वहां न्याय की जगह डर ने ले ली है।

और यह भी कि कमजोर लोगों की जिंदगी अब भी उतनी सुरक्षित नहीं है जितनी हम अपने आधुनिक समाज में मान लेना चाहते हैं।

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बिहार के गांवों से आने वाली ये कहानियाँ सिर्फ अपराध की खबरें नहीं हैं।
ये उस समाज का आईना हैं जहाँ विज्ञान और अंधविश्वास, आधुनिकता और मध्ययुगीन सोच—दोनों एक साथ चल रहे हैं।

हर बार जब किसी महिला को “डायन” कहा जाता है, तो असल में उसके साथ सिर्फ हिंसा नहीं होती—उसके साथ पूरी मानवता की हार भी होती है।

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और शायद सबसे डरावनी बात यह है कि ऐसी घटनाएँ अब भी हो रही हैं, और अक्सर हम उन्हें पढ़कर बस अगले पन्ने पर बढ़ जाते हैं।

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