सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सेंगर को अभी जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा, “सामान्यतः अदालत रिहाई के आदेश पर रोक नहीं लगाती, लेकिन यहां दोषी एक अन्य गंभीर प्रकरण में पहले से ही सजा काट रहा है। इसलिए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाना आवश्यक है।”महत्वपूर्ण टिप्पणियांसुनवाई के दौरान कोर्ट ने दो अहम बिंदुओं पर गंभीर टिप्पणी की:
- यदि POCSO अधिनियम के अंतर्गत एक सामान्य कॉन्स्टेबल को भी लोक सेवक माना जा सकता है, तो एक निर्वाचित विधायक को इससे अलग क्यों रखा जाए? यह कानून के समक्ष समानता का गंभीर सवाल है।
- हाईकोर्ट के जज अत्यंत सक्षम और सम्मानित हैं, लेकिन गलती किसी भी न्यायाधीश से हो सकती है।
23 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने यह तर्क देते हुए सजा निलंबन और जमानत दी थी कि सेंगर ने 7 वर्ष 5 माह की सजा पहले ही काट ली है और उनकी अपील लंबित है। इस फैसले के तुरंत बाद देशभर में तीव्र विरोध प्रदर्शन हुए। पीड़िता पक्ष, महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे “न्याय के साथ समझौता” करार दिया था। सीबीआई ने 29 दिसंबर को ही सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और मात्र कुछ घंटों में सुनवाई होकर रोक लग गई।वर्तमान स्थिति
- कुलदीप सिंह सेंगर फिलहाल जेल में ही रहेंगे। वे पीड़िता के पिता की हिरासत में मृत्यु के अलग मामले में 10 वर्ष की सजा भुगत रहे हैं, जिसकी जमानत अभी नहीं मिली है।
- सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
- मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में संभावित है।
पीड़िता ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा, “मैं तब तक चैन से नहीं बैठूंगी जब तक उसे उम्रकैद से आगे की सजा नहीं मिलती।”यह निर्णय न केवल उन्नाव मामले में, बल्कि POCSO अधिनियम के तहत दोषियों की सजा निलंबन की सीमाओं, प्रभावशाली व्यक्तियों की जवाबदेही और नाबालिग पीड़िताओं के संरक्षण के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्याय व्यवस्था ने एक बार फिर जनभावनाओं और कानून के समानता के सिद्धांत को प्राथमिकता दी है।
























