Site icon Statemedia24

LGBTQ अधिकार: भारत में कानून बदला, समाज अब भी बंटा

LGBTQ अधिकार: भारत में कानून बदला, समाज अब भी बंटा

LGBTQ अधिकार: भारत में कानून बदला, समाज अब भी बंटा

भारत में LGBTQ अधिकारों पर चर्चा होते ही समाज दो हिस्सों में बंटता नजर आता है। एक वर्ग इसे समानता, स्वतंत्रता और मानवाधिकार का विषय मानता है, जबकि दूसरा इसे पारंपरिक सामाजिक मूल्यों के खिलाफ समझता है। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन गया है।

भारत में इस दिशा में सबसे बड़ा कानूनी बदलाव Navtej Singh Johar v. Union of India के जरिए आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने Section 377 IPC के उस हिस्से को खत्म कर दिया, जो वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध मानता था। यह फैसला भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों—विशेषकर समानता, गरिमा और निजता—को ध्यान में रखते हुए दिया गया।

इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में कई भारतीय चेहरों की अहम भूमिका रही है। Laxmi Narayan Tripathi, Harish Iyer और Menaka Guruswamy जैसे लोगों ने इस लड़ाई को सामाजिक और कानूनी दोनों स्तर पर मजबूती दी।

यह समझना जरूरी है कि Section 377 IPC पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अब भी यह कानून गैर-सहमति, नाबालिगों या पशुओं के साथ यौन संबंध जैसे मामलों में लागू होता है। यानी, बदलाव केवल सहमति वाले वयस्क संबंधों के संदर्भ में किया गया है।

वैश्विक स्तर पर LGBTQ अधिकारों की स्थिति बेहद विविध है। कुछ देशों ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की है, जबकि कुछ अब भी कठोर प्रतिबंध लागू करते हैं।

दुनिया के 5 प्रमुख देशों की स्थिति:

बंगाल में ममता का ‘मुस्लिम नैरेटिव’ कितनी दूर तक जाएगा?

इस तुलना से साफ होता है कि LGBTQ अधिकार केवल कानून का नहीं, बल्कि समाज और राजनीति के नजरिए का भी विषय है।

भारत में स्थिति “कानूनी स्वीकृति बनाम सामाजिक स्वीकृति” के बीच अटकी हुई है। शहरी क्षेत्रों में कुछ बदलाव जरूर दिख रहा है—कॉरपोरेट सेक्टर, मीडिया और युवा वर्ग में स्वीकार्यता बढ़ रही है। लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में यह विषय अब भी वर्जना से जुड़ा हुआ है।

कानपुर की सिसामऊ सीट पर 2027 से पहले किस दिशा में बह रही है राजनीतिक हवा?

भारत एक ऐसे दौर में है जहां कानून ने रास्ता खोल दिया है, लेकिन समाज को अभी उस रास्ते पर चलना बाकी है। Section 377 IPC में बदलाव ने अधिकार तो दिए हैं, लेकिन असली बदलाव तब होगा जब सामाजिक सोच भी समानता और गरिमा को स्वीकार करेगी। LGBTQ अधिकारों की बहस अंततः इसी सवाल पर आकर टिकती है—क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां हर व्यक्ति को अपनी पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिले?

Exit mobile version