शहीद Bhagat Singh, Sukhdev Thapar और Shivaram Rajguru के शहादत दिवस की पूर्व संध्या पर कानपुर में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें क्रांति की विरासत को याद करने के साथ-साथ उसे संरक्षित करने की दिशा में ठोस पहल की गई। इस अवसर पर ‘क्रांति स्मृति संरक्षण समिति’ का गठन किया गया और 1857 से 1947 तक के क्रांतिवीरों के वंशजों को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में नई दिल्ली से आए वरिष्ठ लेखक Pankaj Chaturvedi की पुस्तक Mere Bhagat Singh पर एक गंभीर परिचर्चा भी आयोजित हुई, जिसमें साहित्य, इतिहास और वर्तमान पीढ़ी के बीच संवाद की जरूरत पर जोर दिया गया।
पेंगुइन स्वदेश के संपादक डॉ. संजीव मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि भगत सिंह पर लिखा गया साहित्य नई पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने तीखे अंदाज में कहा कि “हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा डॉक्टर-इंजीनियर बने और भगत सिंह पड़ोसी के घर पैदा हों।” उनके इस कथन ने समाज की मानसिकता पर एक गहरा सवाल खड़ा किया। उन्होंने यह भी कहा कि भगत सिंह का कानपुर से जुड़ाव और यहां का ‘कनपुरियापन’ उनके व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देता है।
डॉ. ज्योत्स्ना मिश्रा ने पुस्तक की विशेषता बताते हुए कहा कि यह केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि भगत सिंह के साथ एक आत्मीय संबंध स्थापित करने का प्रयास है। उनके अनुसार, इस पुस्तक के जरिए भगत सिंह की इच्छाशक्ति, ऊर्जा और देश के प्रति समर्पण को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश की गई है।
स्वयं लेखक पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि Kanpur भगत सिंह की कर्मभूमि रहा है। उन्होंने बताया कि प्रताप प्रेस में ‘बलवंत’ नाम से भगत सिंह ने पत्रकारिता की और यह पुस्तक उनके इसी कानपुर प्रेम को समर्पित है।
इतिहासकार अनूप शुक्ला ने अपने संबोधन में भगत सिंह के पत्रकार रूप पर प्रकाश डालते हुए कानपुर और दिल्ली के दंगों की उनकी रिपोर्टिंग के रोचक प्रसंग साझा किए। साथ ही उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कानपुर की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि इस शहर ने क्रांति का बिगुल फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई थी।
सुधीन्द्र पाण्डेय ने कहा कि 1857 से 1947 तक कानपुर लगातार क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना रहा। उन्होंने असेंबली बम कांड सहित कई ऐतिहासिक घटनाओं में शहर की भागीदारी को याद किया।
कार्यक्रम के दौरान ‘क्रांति स्मृति संरक्षण समिति’ के महासचिव क्रांति कुमार ने समिति के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए बताया कि संस्था तीन प्रमुख लक्ष्यों पर काम करेगी—क्रांतिवीरों के जीवन और कार्यों पर शोध, उनके स्मारकों और ऐतिहासिक निशानियों का संरक्षण, तथा दुर्लभ साहित्य का पुनर्प्रकाशन। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि शहादत दिवस के अवसर पर कानपुर प्रशासन को स्मारकों के संरक्षण हेतु एक प्रस्ताव पत्र सौंपा जाएगा।
इस अवसर पर जिन क्रांतिवीरों के वंशजों को सम्मानित किया गया, उनमें Tatya Tope, Ganesh Shankar Vidyarthi, मानवती आर्या, डॉ. गया प्रसाद कटियार, सुरेन्द्र पाण्डेय, रमेश चंद्र गुप्त, गुलाब चंद सेठ, Shyam Lal Gupta ‘पार्षद’, शिव कुमार मिश्र, उमा शंकर तिवारी, दादा देवीदत्त अग्निहोत्री, पूरनचंद सनक, Jaidev Kapoor और रामनारायण आज़ाद के परिजन शामिल रहे।
कार्यक्रम का संचालन पत्रकार एवं लेखक प्रखर श्रीवास्तव ने किया, जबकि समिति अध्यक्ष कौशल किशोर शर्मा ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
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कार्यक्रम में अनीता मिश्रा, प्रो. बृजेश सिंह, भावना मिश्रा, नीरज चतुर्वेदी, अनिल सिन्दूर, उषा निगम, रंजीत संतानिया, देव कबीर सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
यह आयोजन केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी था कि यदि इतिहास की इन विरासतों को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपने क्रांतिकारी अतीत से कट जाएंगी। ‘क्रांति स्मृति संरक्षण समिति’ का गठन इस दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है, जो स्मृति और इतिहास के बीच सेतु बनाने का प्रयास है।
























