भारतीय सिनेमा और टेलीविजन की दुनिया में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो सिर्फ अभिनय नहीं करते, बल्कि अपने दौर की सोच और समाज को भी प्रभावित करते हैं। Priya Tendulkar उन्हीं चुनिंदा कलाकारों में शामिल थीं।
आज की पीढ़ी शायद उन्हें उतना याद न करती हो, लेकिन एक समय ऐसा था जब दूरदर्शन पर उनका चेहरा दिखाई देते ही लोग टीवी के सामने बैठ जाया करते थे। वह सिर्फ अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि एक तेज दिमाग, बेबाक व्यक्तित्व और संवेदनशील कलाकार भी थीं। अफसोस, महज 47 साल की उम्र में उनका सफर खत्म हो गया।
एक साहित्यिक और कलात्मक माहौल में बचपन
प्रिया तेंदुलकर का जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहां साहित्य और कला रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे। उनके पिता Vijay Tendulkar भारतीय रंगमंच के सबसे बड़े नामों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिंदी और मराठी थिएटर को कई यादगार नाटक दिए। फिल्मों और टीवी के लिए भी उन्होंने लेखन किया।
घर का यही माहौल प्रिया के भीतर भी कला के प्रति झुकाव पैदा करता गया। पढ़ाई में वह हमेशा आगे रहती थीं। उन्होंने पॉलिटिकल साइंस में डिग्री ली और साथ ही चित्रकारी में डिप्लोमा भी किया। अभिनय से पहले उनकी जिंदगी कई अलग-अलग अनुभवों से होकर गुजरी।
उन्होंने कभी फाइव स्टार होटल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी की, कभी एयर होस्टेस रहीं, मॉडलिंग की, और दूरदर्शन पर न्यूज़ रीडिंग भी की। शायद यही वजह थी कि बाद में उनके अभिनय में एक अलग तरह का आत्मविश्वास दिखाई देता था।
थिएटर से शुरू हुआ सफर
साल 1969 में प्रिया तेंदुलकर ने रंगमंच की दुनिया में कदम रखा। उनका पहला चर्चित नाटक था Hayavadana, जिसे Girish Karnad ने लिखा था। इस नाटक में उनके साथ Kalpana Lajmi भी थीं।
पहले ही नाटक में उनके अभिनय को सराहना मिली। मंच पर उनकी पकड़ और संवाद बोलने का अंदाज अलग दिखाई देता था। धीरे-धीरे थिएटर उनकी पहचान बनता गया।
आर्ट सिनेमा से कमर्शियल फिल्मों तक
फिल्मों में उनकी शुरुआत हुई Shyam Benegal की चर्चित फिल्म Ankur से। इसी फिल्म से Shabana Azmi का करियर भी शुरू हुआ था।
प्रिया तेंदुलकर उन कलाकारों में थीं जिन्होंने खुद को किसी एक भाषा या एक तरह के सिनेमा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने हिंदी, मराठी, गुजराती और कन्नड़ फिल्मों में काम किया। आर्ट फिल्मों में गंभीर किरदार निभाए तो कमर्शियल फिल्मों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
लेकिन फिल्मों से ज्यादा लोकप्रियता उन्हें टीवी ने दी।
जब पूरा देश उन्हें “रजनी” कहने लगा
दूरदर्शन का चर्चित धारावाहिक Rajani प्रिया तेंदुलकर के करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
इस शो में उन्होंने एक ऐसी आम भारतीय महिला का किरदार निभाया जो सिस्टम से सवाल पूछती थी, भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी होती थी और रोजमर्रा की परेशानियों पर आवाज उठाती थी।
उस दौर में टीवी पर ऐसे किरदार बहुत कम दिखाई देते थे। यही वजह थी कि दर्शकों ने प्रिया तेंदुलकर को उनके असली नाम से ज्यादा “रजनी” के नाम से पहचानना शुरू कर दिया।
दिलचस्प बात यह है कि इस शो में Shah Rukh Khan ने भी एक छोटा सा कैमियो किया था।
निजी जिंदगी में बढ़ती दूरी
साल 1988 में प्रिया तेंदुलकर ने अभिनेता, लेखक और निर्देशक Karan Razdan से शादी की। दोनों ने साथ काम भी किया था और शुरुआती वर्षों में उनका रिश्ता काफी अच्छा माना जाता था।
लेकिन समय के साथ रिश्ते में तनाव बढ़ने लगा। आखिरकार शादी के सात साल बाद, 1995 में दोनों का तलाक हो गया।
तलाक के बाद करण राजदान ने दूसरी शादी कर ली, लेकिन प्रिया ने खुद को पूरी तरह अपने काम में डुबो दिया। उन्होंने Trimurti, Gupt और कई अन्य फिल्मों में काम किया।
साल 2001 में रिलीज हुई Pyaar Ishq Aur Mohabbat उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई।
बीमारी, अकेलापन और अंतहीन संघर्ष
साल 1999 में प्रिया तेंदुलकर को पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। इलाज शुरू हुआ, लेकिन बीमारी पूरी तरह काबू में नहीं आ सकी।
शारीरिक तकलीफों के बीच भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा। शायद अभिनय उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं, जीने का तरीका बन चुका था।
फिर निजी जिंदगी में भी दुखों का दौर शुरू हो गया। साल 2001 में उनकी मां और भाई दोनों का निधन हो गया। इन घटनाओं ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया।
लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से अपनी कमजोरी जाहिर नहीं की।
19 सितंबर 2002 को हार्ट फेल होने की वजह से प्रिया तेंदुलकर का निधन हो गया।
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क्यों याद की जाती हैं प्रिया तेंदुलकर?
प्रिया तेंदुलकर सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थीं। वह उस दौर की उन महिलाओं में थीं जिन्होंने स्क्रीन पर मजबूत, सवाल पूछने वाली और आत्मनिर्भर भारतीय महिला की छवि को लोकप्रिय बनाया।
आज जब ओटीटी और सोशल मीडिया के दौर में “बोल्ड” किरदारों की चर्चा होती है, तब यह याद रखना जरूरी है कि बहुत पहले दूरदर्शन के सीमित दौर में भी प्रिया तेंदुलकर जैसी कलाकारें सिस्टम से सवाल पूछ रही थीं।
उनका जाना सिर्फ सिनेमा का नुकसान नहीं था।
भारतीय रंगमंच, टीवी और सामाजिक चेतना— तीनों ने एक साथ एक मजबूत आवाज खो दी थी।



















