नेपाल संकट – प्रकृति से जीतना संभव नही है !

भारत का सबसे बड़ा संकट किसी युद्ध, आर्थिक मंदी या बेरोजगारी से नहीं, बल्कि उस चीज से पैदा हो जो हर दिन हमारे आसपास मौजूद है—मौसम से।

2024 भारत के लिए केवल एक गर्म साल नहीं था। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 2024 देश में 1901 के बाद से दर्ज सबसे गर्म वर्ष रहा और औसत भूमि सतह तापमान सामान्य से 0.65 डिग्री सेल्सियस अधिक था। उसी वर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़, भूस्खलन, बिजली गिरने, आंधी, लू और अन्य चरम मौसमी घटनाओं से करीब 2,400 लोगों की मौत हुई, जिनमें 1,280 से अधिक मौतें बिजली गिरने और आंधी-तूफान से हुईं। दिलचस्प यह है कि पूरे देश की सालाना बारिश सामान्य से अधिक—दीर्घकालिक औसत की 104 प्रतिशत—थी। यानी समस्या केवल “बारिश कम होना” नहीं है; समस्या यह भी है कि बारिश कब, कहां और कितनी तीव्रता से होती है। 

यहीं से भारत के विकास मॉडल के सामने एक असहज सवाल खड़ा होता है।

क्या हम प्रकृति को बदलने की अपनी क्षमता को विकास समझ बैठे हैं?

क्योंकि सड़कें हम बना सकते हैं, लेकिन बारिश को सड़क के हिसाब से नहीं चला सकते। पहाड़ में सुरंग खोद सकते हैं, लेकिन पहाड़ की भूगर्भीय संरचना को अपनी परियोजना के हिसाब से नहीं बदल सकते। नदी पर बांध बना सकते हैं, लेकिन नदी को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। शहर को कंक्रीट से ढक सकते हैं, लेकिन फिर बारिश के पानी को जमीन में जाने से रोकने की कीमत भी चुकानी होगी।

प्रकृति को कुछ समय के लिए पीछे धकेला जा सकता है।

हराया नहीं जा सकता।

और शायद भारत की अगली बड़ी नीति-बहस यही होनी चाहिए।

यह केवल जलवायु परिवर्तन नहीं, हमारी planning की परीक्षा है

जलवायु परिवर्तन को अक्सर तापमान बढ़ने की कहानी बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन भारत के लिए असली समस्या कहीं अधिक जटिल है।

2021 में Council on Energy, Environment and Water के जिला-स्तरीय अध्ययन ने पाया कि भारत की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे जिलों में रहती है जो अत्यधिक जल-मौसम संबंधी आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। अध्ययन में असम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार को अत्यधिक जलवायु जोखिम वाले प्रमुख राज्यों में रखा गया था। 

इस आंकड़े को केवल climate statistic समझना भूल होगी।

इसका मतलब है कि जलवायु जोखिम अब कोई दूर का भविष्य नहीं है। यह भारत की आबादी, शहरों, कृषि, स्वास्थ्य, रोजगार और infrastructure के बीच पहले से मौजूद है।

और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जोखिम हर जगह एक जैसा नहीं है।

कहीं बाढ़ बढ़ रही है, कहीं सूखा। कहीं गर्मी का संकट है, कहीं चक्रवात। कहीं बारिश की तीव्रता बढ़ रही है तो कहीं लंबे dry spells के बाद अचानक cloudburst जैसी घटनाएं समस्या बन रही हैं।

यानी एक राष्ट्रीय environmental policy पर्याप्त नहीं होगी।

भारत को जिला, नदी बेसिन, तटीय क्षेत्र, पहाड़ी क्षेत्र और शहरी क्षेत्र की अलग-अलग ecological reality के हिसाब से planning करनी होगी।

गर्मी अब मौसम नहीं, आर्थिक जोखिम है

2025 के एक जिला-स्तरीय CEEW अध्ययन ने 734 जिलों का heat-risk assessment किया। इसके अनुसार 417 जिले high या very high heat-risk category में थे और इन जिलों में भारत की लगभग 76 प्रतिशत आबादी रहती है। अध्ययन में केवल दिन का तापमान नहीं, बल्कि रात की गर्मी, humidity, population density, built-up area और vulnerability जैसे कारकों को भी शामिल किया गया। 

यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव समझना होगा।

पहले गर्मी को मौसम विभाग की सूचना समझा जाता था:

“आज तापमान 45 डिग्री है।”

अब इसे आर्थिक सूचना की तरह देखना होगा:

“45 डिग्री तापमान का मजदूरी, बिजली, स्वास्थ्य, कृषि और productivity पर कितना प्रभाव पड़ेगा?”

एक construction worker, सड़क पर काम करने वाला मजदूर या खेत में काम करने वाला किसान वातानुकूलित कार्यालय में काम करने वाले व्यक्ति की तरह गर्मी का सामना नहीं करता।

इसलिए climate change का सबसे बड़ा बोझ अक्सर उस व्यक्ति पर पड़ता है जिसकी आर्थिक क्षमता सबसे कम होती है।

यानी जलवायु संकट अपने आप में inequality multiplier है।

भारत का एक और मौन संकट जमीन के नीचे चल रहा है

हम मौसम की खबरें टीवी पर देखते हैं। लेकिन groundwater की कहानी चुपचाप जमीन के नीचे चलती है।

भारत सरकार के Central Ground Water Board के 2024 assessment के अनुसार देश में सालाना groundwater extraction 245.64 billion cubic metres था। इसका लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा कृषि में इस्तेमाल हुआ, जबकि घरेलू उपयोग 11 प्रतिशत और औद्योगिक उपयोग लगभग 2 प्रतिशत था। देश का overall groundwater extraction stage 60.47 प्रतिशत आंका गया, लेकिन पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और कुछ अन्य क्षेत्रों में extraction 100 प्रतिशत से भी ऊपर था। उत्तर प्रदेश भी 70–90 प्रतिशत वाले समूह में था। (Central Ground Water Board)

यह आंकड़ा एक असुविधाजनक सच्चाई बताता है।

हम अक्सर पानी की समस्या का समाधान नए reservoir, नई pipeline या नई water scheme में खोजते हैं।

लेकिन असली सवाल कभी-कभी यह होना चाहिए:

जिस पानी को हम निकाल रहे हैं, वह वापस जमीन में जा भी रहा है या नहीं?

अगर नहीं, तो हम भविष्य का पानी आज खर्च कर रहे हैं।

और यही environmental policy की सबसे बड़ी चुनौती है—सरकारें अक्सर उस चीज की कीमत नहीं गिनतीं जो बाजार में तुरंत दिखाई नहीं देती।

Groundwater का depletion GDP में उसी तरह नहीं दिखाई देता जैसे कोई factory का production दिखाई देता है।

लेकिन जब कुआं सूखता है, तब उसकी आर्थिक कीमत किसान चुकाता है।

शहरों ने प्रकृति की सबसे जरूरी सेवाएं concrete से ढक दीं

शहरी विकास में हमने जमीन को plot में बदलना सीखा, लेकिन यह भूल गए कि जमीन केवल निर्माण की जगह नहीं होती।

वह पानी सोखती है।

तालाब केवल सुंदर landscape नहीं होते। वे storm-water management का हिस्सा हैं।

Wetlands खाली जमीन नहीं हैं। वे शहर के प्राकृतिक drainage system का हिस्सा हैं।

पेड़ केवल greenery नहीं हैं। वे heat mitigation, carbon storage, air filtration और urban comfort की infrastructure हैं।

लेकिन हमारी planning में अक्सर concrete infrastructure को infrastructure माना जाता है और natural infrastructure को खाली जगह।

यही सोच भविष्य में महंगी पड़ सकती है।

एक शहर अगर अपनी wetlands भर देता है, drainage channels पर निर्माण कर देता है और हर खुली जमीन को concrete में बदल देता है, तो भारी बारिश के समय समस्या केवल “बहुत ज्यादा बारिश” नहीं होती।

समस्या यह भी होती है कि पानी के पास जाने के लिए जगह नहीं बची।

इसलिए हर शहरी master plan में केवल सड़क, फ्लाईओवर, मेट्रो और housing density की गणना पर्याप्त नहीं होनी चाहिए।

उसे यह भी बताना चाहिए:

इस शहर को पानी रोकने, सोखने और निकालने की प्राकृतिक क्षमता कितनी चाहिए?

Composite development बनाम ecological limits

भारत में infrastructure की आवश्यकता वास्तविक है। सड़क चाहिए। रेल चाहिए। बिजली चाहिए। शहर चाहिए। उद्योग चाहिए।

इसलिए पर्यावरण की बात को विकास-विरोधी बनाना भी गलत होगा।

समस्या विकास में नहीं है।

समस्या उस विकास में है जो अपने environmental cost को भविष्य के खाते में डाल देता है।

अगर किसी पहाड़ी सड़क की निर्माण लागत कम है लेकिन उसके कारण लगातार landslide होते हैं, traffic बंद होता है और हर साल repair पर पैसा खर्च होता है, तो उसकी वास्तविक लागत project report से कहीं अधिक है।

अगर किसी शहर में floodplain पर निर्माण करके हजारों घर बनाए जाते हैं और हर कुछ साल में बाढ़ से नुकसान होता है, तो उन घरों की construction cost ही पूरी लागत नहीं है।

अगर भूजल लगातार नीचे जा रहा है और भविष्य में पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर से लाना पड़ेगा, तो आज निकाला गया groundwater वास्तव में मुफ्त नहीं था।

हमने प्रकृति से उधार लिया है और उसे सरकारी budget में liability के रूप में दर्ज नहीं किया।

अब यही बदलना होगा।

पर्यावरण नीति को “पेड़ लगाने” से आगे जाना होगा

भारत में पर्यावरण नीति की चर्चा अक्सर tree plantation, plastic ban और pollution control तक सीमित हो जाती है।

ये जरूरी हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं।

एक विशेषज्ञ environmental policy के लिए कम-से-कम पांच स्तरों पर एक साथ काम करना होगा।

पहला—Climate-resilient infrastructure

नई सड़क, पुल, railway, housing और industrial project बनाते समय केवल construction cost नहीं, अगले 30–50 वर्षों का climate risk भी calculate करना होगा।

दूसरा—Natural infrastructure को infrastructure मानना

Wetlands, forests, mangroves, floodplains और urban lakes को “unused land” की तरह देखना बंद करना होगा।

तीसरा—Water budgeting

हर जिले को यह पता होना चाहिए कि उसके पास कितना groundwater recharge है और कितना extraction हो रहा है।

चौथा—Heat planning

हर बड़े शहर को heat action plan से आगे जाकर urban design बदलना होगा—पेड़, shade, cool roofs, water access, working-hour changes और vulnerable populations की protection को planning का हिस्सा बनाना होगा।

पांचवां—Long-term environmental accounting

GDP बढ़ रहा है—यह अच्छी खबर है।

लेकिन साथ में यह भी पूछा जाए:

हमने कितनी groundwater reserve खोई? कितने wetlands खोए? कितने ecological buffers कम हुए? climate risk कितना बढ़ा?

जिस नुकसान को हम मापते नहीं, उसे रोकने की राजनीतिक इच्छा भी कमजोर रहती है।

सबसे कठिन बदलाव सरकार में नहीं, हमारी विकास की मानसिकता में चाहिए

सरकार से सवाल करना आसान है।

लेकिन समाज को भी खुद से सवाल करना होगा।

हम हर जगह सड़क चाहते हैं।

हर नदी किनारे construction चाहते हैं।

हर पहाड़ी जगह पर resort चाहते हैं।

हर शहर में ज्यादा जमीन और ज्यादा concrete चाहते हैं।

हर गर्मी में ज्यादा बिजली चाहते हैं।

हर खेत में ज्यादा पानी चाहते हैं।

और फिर जब प्रकृति इसका bill भेजती है तो हम केवल सरकार से पूछते हैं—आपने तैयारी क्यों नहीं की?

लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका केवल सरकार चुनना नहीं है।

विकास की मांग करना भी राजनीतिक निर्णय है।

अगर समाज का हर हिस्सा केवल immediate convenience मांगता रहेगा, तो सरकारें भी short-term projects की राजनीति करेंगी।

क्योंकि चुनाव पांच साल बाद है।

लेकिन groundwater का संकट बीस साल बाद सामने आएगा।

शहर की heat-island problem दस साल में गंभीर होगी।

किसी नदी का ecological collapse कई दशकों में दिखाई देगा।

राजनीति और प्रकृति के समय में यही सबसे बड़ा अंतर है।

राजनीति अगले चुनाव को देखती है; प्रकृति अगली पीढ़ी को।

हमें प्रकृति से समझौता नहीं, उसके साथ संबंध बदलना होगा

अब समय आ गया है कि पर्यावरण को विकास के रास्ते में खड़ी बाधा समझना बंद किया जाए।

असल में पर्यावरण ही विकास की जमीन है।

किसान को पानी चाहिए।

उद्योग को पानी और ऊर्जा चाहिए।

शहर को हवा और drainage चाहिए।

सड़क को स्थिर जमीन चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था को रहने योग्य climate चाहिए।

अर्थव्यवस्था को predictable मौसम चाहिए।

इसलिए पर्यावरण की रक्षा कोई “luxury agenda” नहीं है।

यह economic security है।

और आने वाले समय में शायद दुनिया के देशों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल इस बात पर नहीं होगी कि किसके पास ज्यादा उद्योग हैं, बल्कि इस पर भी होगी कि किस देश ने बदलती जलवायु के लिए अपने समाज और infrastructure को बेहतर तैयार किया है।

भारत के लिए चुनौती बहुत बड़ी है, लेकिन अवसर भी उतना ही बड़ा है।

हम ऐसा विकास मॉडल बना सकते हैं जिसमें सड़कें भी हों और floodplain भी बचे रहें; शहर भी बढ़ें और wetlands भी बचें; उद्योग भी आएं और पानी का budget भी बना रहे; पहाड़ों में tourism भी हो और उनकी carrying capacity भी तय हो।

इसके लिए विकास रोकना नहीं पड़ेगा।

विकास को समझदार बनाना पड़ेगा।

अंत में सवाल प्रकृति का नहीं, हमारा है

प्रकृति ने कभी हमसे यह वादा नहीं किया था कि वह हमारे शहरों के हिसाब से मौसम बदलेगी।

नदियों ने नहीं कहा था कि वे हमारे नक्शों की सीमाओं में बहेंगी।

पहाड़ों ने नहीं कहा था कि हमारी सड़क परियोजनाओं के लिए वे अपनी स्थिरता छोड़ देंगे।

और धरती ने यह भी नहीं कहा था कि हम जितना पानी निकालेंगे, उतना ही वह हर साल वापस भर देगी।

हमने ये उम्मीदें खुद बना लीं।

अब हमें अपनी उम्मीदें बदलनी होंगी।

प्रकृति को हराने की कोशिश में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस दिन हम जीत जाएंगे, उस दिन रहने के लिए प्रकृति बचेगी ही नहीं।

इसलिए अगली पीढ़ी को हमें केवल ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े शहर नहीं देने हैं।

हमें उसे ऐसी धरती देनी है जिस पर वह उन इमारतों में रह सके, उन सड़कों पर चल सके और उन शहरों में सांस ले सके।

शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक अनुबंध होना चाहिए—

आज की सुविधा के लिए आने वाली पीढ़ी का भविष्य गिरवी नहीं रखा जाएगा।

क्योंकि प्रकृति किसी एक सरकार, किसी एक पार्टी या किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं है।

हम सब उसके किरायेदार हैं—और आने वाली पीढ़ी उस घर की अगली निवासी है।

सवाल सिर्फ इतना है कि जब चाबी उसके हाथ में जाएगी, तब घर रहने लायक बचेगा भी या नहीं।